
बंगले का मास्टर बेडरूम।
भारी लाल पर्दे खींचे हुए, सिर्फ एक लाल अबीर की लाइट जल रही थी जो कमरे को गहरा, गर्म लाल रंग दे रही थी। हवा में अगरबत्ती की महक थी, लेकिन उसमें एक तनाव भरा हुआ था। फर्श पर गुलाब की पंखुड़ियाँ बिखरी हुईं, लेकिन वो अब कुचली जा रही थीं।
वीरभद्र प्रताप सिंह बिस्तर के किनारे पर बैठा था।
काला शेरवानी अभी भी बदन पर, बस ऊपर का बटन खुला। हाथ में व्हिस्की का गिलास, लेकिन वो पी नहीं रहा — बस उँगलियों से घुमा रहा था। आँखें पत्थर की तरह शांत, लेकिन उनमें एक ठंडी, क्रूर चमक थी। चेहरा ऐसा, जैसे कोई भावना वहाँ कभी रहती ही न हो।
दरवाज़ा धीरे से खुला।
गौरांगी अंदर आई।
लाल जोड़ा भारी, घाघरा चोली में वो लग रही थी जैसे कोई मूर्ति — माथे पर सिंदूर की गहरी लकीर, हाथों में मेहंदी अभी ताज़ा, गले में भारी हार, कानों में झुमके। चेहरा झुका हुआ, पलकें नीची, लेकिन साँसें तेज़। पाँवों की पायल की झनकार हर कदम पर कमरे में गूँज रही थी। वो डर रही थी, लेकिन उस डर के नीचे एक भोली-सी उत्सुकता थी — वो पहली बार किसी मर्द के इतने करीब आने वाली थी, और वो मर्द उसका पति था।
वो धीरे-धीरे उसके पास आई, बिस्तर के सामने रुक गई। हाथ जोड़े हुए, जैसे प्रार्थना कर रही हो।
"आप… आप ठीक हैं?" उसकी आवाज़ बहुत छोटी, काँपती हुई।
वीरभद्र ने गिलास साइड टेबल पर पटका — आवाज़ तेज़ आई। नज़र उठाई, गौरांगी के पूरे बदन पर घुमाई — धीरे-धीरे, ऊपर से नीचे तक। कोई शरम नहीं, सिर्फ़ कब्ज़े की नज़र।
"दरवाज़ा बंद कर, और चुपचाप खड़ी मत रह। आ जा मेरे पास।"
गौरांगी ने काँपते हाथों से दरवाज़ा बंद किया। फिर वापस लौटी। अब भी सिर झुकाए।
वीरभद्र उठा। लंबा कद, चौड़ा कंधा — वो उसके इतने करीब आया कि गौरांगी को उसकी साँस महसूस हुई। उसने एक हाथ से गौरांगी की ठुड्डी पकड़ी, उँगलियाँ गालों में धँसा दीं, चेहरा ज़ोर से ऊपर उठाया।
"मुझे देख, साली। जब मैं बोलूँ तो आँखें नीची मत कर। समझी, हरामज़ादी?"
गौरांगी की आँखें फैल गईं। आँसू छलक आए, लेकिन वो चुप रही। काँपती आँखों से उसकी तरफ़ देखा।
वीरभद्र ने हँसा — ठंडी, क्रूर हँसी। "अरे वाह, गाँव की मासूम बहू… कितनी भोली लग रही है। लेकिन आज रात तू मेरी चूत बनेगी। कपड़े उतार, जल्दी। नहीं तो मैं फाड़ दूँगा सब।"
गौरांगी की साँस रुक गई। वो एक पल स्तब्ध रही। फिर धीरे-धीरे दुपट्टा उतारा। चोली के हुक खोलने लगी — उँगलियाँ काँप रही थीं। हर हुक खुलने पर उसकी छाती तेज़-तेज़ ऊपर-नीचे हो रही थी। चोली ज़मीन पर गिर गई। अब सिर्फ़ ब्रा और घाघरा-पेटीकोट में। मेहंदी वाले हाथ सीने पर रखकर ढकने की कोशिश कर रही थी।
वीरभद्र ने उसका हाथ पकड़ा, ज़ोर से हटाया। "हाथ हटा, रंडी। ढकने की क्या ज़रूरत? ये सब अब मेरा है। ब्रा भी उतार।"
गौरांगी ने काँपते हाथों से ब्रा के हुक खोले। ब्रा गिर गई। उसकी छाती नंगी हो गई — गुलाबी निप्पल्स सर्दी और डर से सख्त। वो शर्म से सिर झुका लेना चाहती थी, लेकिन वीरभद्र ने फिर ठुड्डी पकड़ ली।
"देख, कितनी सुंदर चूचियाँ हैं तेरी। गाँव में किसी ने दबाई भी नहीं क्या? अच्छा है… मैं आज पहली बार दबाऊँगा, और काटूँगा भी।"
उसने एक हाथ से गौरांगी की एक छाती पकड़ी — ज़ोर से दबाई। गौरांगी की सिसकी निकली। दर्द हुआ, लेकिन वो चुप रही। वीरभद्र ने दूसरी छाती पर मुँह लगाया — चूसा, काटा। दाँतों से निप्पल पकड़कर खींचा। गौरांगी की आँखों से आँसू बह निकले। "आह… प्लीज़…"
"प्लीज़ क्या? चुप रह, भोसड़ी के। ये तो शुरुआत है।"
उसने गौरांगी को एक झटके में बिस्तर पर धकेल दिया। घाघरा ऊपर चढ़ गया। वीरभद्र ने पेटीकोट की डोरी खींची — कपड़ा फट गया। अब गौरांगी सिर्फ़ लाल पैंटी में थी। वो हाथों से नीचे ढकने लगी, लेकिन वीरभद्र ने दोनों कलाइयाँ पकड़कर सिर के ऊपर दबा दीं।
"हाथ मत हिलाना। तेरी ये टाइट चूत आज मेरी है।"
उसने उँगली से पैंटी के ऊपर से सहलाया — धीरे-धीरे, लेकिन ज़ोर से दबाते हुए। गौरांगी का बदन सिहर उठा। वो अनजाने में कमर उठा रही थी। वीरभद्र ने पैंटी फाड़ दी — एक ही झटके में। अब वो पूरी नंगी थी।
वीरभद्र ने अपना शेरवानी उतारा, शर्ट फाड़ी। बदन पर पुराने निशान — घाव, निशान। वो पैंट उतारा। उसका लिंग खड़ा, तैयार। गौरांगी ने देखा तो आँखें बंद कर लीं।
"डर मत। ये तेरे अंदर जाएगा। पूरा। और तू चीखेगी, लेकिन मैं रुकूँगा नहीं।"
उसने गौरांगी की टाँगें फैलाईं। एक हाथ से अपना लिंग पकड़ा, दूसरे से उसकी कमर। बिना किसी और तैयारी के — एक तेज़, कठोर धक्का।
गौरांगी की चीख निकल गई — तेज़, दर्द भरी। "आआआह… दर्द हो रहा है!"
"दर्द? ये तो तेरी सुहागरात है, हरामज़ादी। सह ले।" वीरभद्र ने और ज़ोर से धक्का मारा। खून की हल्की लकीर चादर पर फैल गई। गौरांगी के होंठ कट गए, खून निकला। लेकिन वो रोई नहीं — दाँत पीसकर सह रही थी।
वीरभद्र की हरकतें तेज़ होती गईं। हर धक्के के साथ वो गालियाँ देता रहा — "ले साली… पूरी चूत भर ले… मेरी रंडी बन जा… गाँव की मासूम अब शहर की चूत बनेगी।"
गौरांगी का दर्द धीरे-धीरे एक अजीब गर्मी में बदल रहा था। उसका बदन अब साथ दे रहा था — कमर उठाकर, टाँगें फैलाकर। वो सिसक रही थी, लेकिन अब सिसकियों में एक भूख भी थी।
वीरभद्र ने उसकी छाती फिर से दबाई, काटी। "चोदूँगा तुझे पूरी रात… तू मेरी है, समझी?"
कई मिनट बाद, जब वो आखिरी बार ज़ोर से धक्का मारकर रुका — गौरांगी के अंदर गरमाहट फैल गई। वो थककर लेट गई। बदन पसीने, खून और वीर्य से सना हुआ।
वीरभद्र उठा। सिगरेट जलाई। बिना पलटे बोला, "अच्छा सह लिया। अब सो जा। कल से और ट्रेनिंग मिलेगी।"
गौरांगी ने आँखें बंद कीं। दर्द था, लेकिन मन में एक बात पक्की — वो उसका पति है। उसकी औरत। पूरी तरह।
रात अभी बाकी थी।
ये शुरुआत थी — एक क्रूर, गहरे, बिना शर्म के रिश्ते की।
To be continued


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