
वीरभद्र बाथरूम से निकला।
तौलिया लपेटे हुए, बदन पर पानी की बूँदें चमक रही थीं। बाल गीले, चेहरा अभी भी पत्थर जैसा — लेकिन अब आँखों में एक नई भूख थी, जैसे पहला दौर सिर्फ़ शुरुआत था। वो बिस्तर की तरफ़ देखा।

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वीरभद्र बाथरूम से निकला।
तौलिया लपेटे हुए, बदन पर पानी की बूँदें चमक रही थीं। बाल गीले, चेहरा अभी भी पत्थर जैसा — लेकिन अब आँखों में एक नई भूख थी, जैसे पहला दौर सिर्फ़ शुरुआत था। वो बिस्तर की तरफ़ देखा।

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