सुबह का पहला उजाला — हवेली का बड़ा डाइनिंग हॉल।
सूरज की किरणें झरोखों से छनकर आ रही थीं। लंबी महोगनी टेबल पर परिवार बैठा था — वीरभद्र के पिता (बूढ़े ज़मींदार), माँ, दो छोटे सगे भाई, और विधवा भाभी रुक्मिणी (25 साल की, गोरी, भरपूर जिस्म वाली)। रुक्मिणी ने आज हल्की नीली साड़ी पहनी थी, ब्लाउज़ गहरा कट वाला, पल्लू जानबूझकर ढीला। वो वीरभद्र के ठीक सामने बैठी थी। हर बार झुकते वक्त छाती की गहराई थोड़ी-थोड़ी दिख जाती। पैर टेबल के नीचे हल्के से वीरभद्र के जूते को छू रहे थे — एक छोटी-सी छेड़छाड़ वाली अदाकारी।


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