
कुछ दिन बीत गए।
हवेली में अब एक नया संतुलन बन चुका था — बाहर से शांत, अंदर से उबलता हुआ। गौरांगी अब वो भोली-सी गाँव वाली लड़की नहीं रही। रात-रात भर की क्रूर चुदाई, गालियाँ, दर्द और समर्पण ने उसे बदल दिया था। अब वो डरती नहीं थी — बल्कि उसमें एक अजीब-सी भूख जाग चुकी थी। वो अब वीरभद्र की नज़रों में देखकर मुस्कुराती, कभी-कभी खुद ही उसकी गोद में बैठ जाती, और जब वो गालियाँ देता तो वो भी जवाब में होंठ चाटकर कहती — "और दो... और गंदी बोलो..."


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