
वीरभद्र का शक अब पक्का हो चुका था।
रुक्मिणी के कमरे से आने वाली वो कराहें, अर्जुन की चुपके-चुपके आने-जाने की आदत — सब कुछ उसके सामने साफ़ था। लेकिन वो चुप रहा। गुस्सा अंदर ही अंदर उबाल रहा था, जैसे कोई ज्वालामुखी। वो जानता था — अगर अब फटेगा, तो सब कुछ तबाह हो जाएगा, लेकिन वो चाहता भी था कि सब कुछ तबाह हो जाए।

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