रात के 11 बज चुके थे।
हवेली में सन्नाटा। पिता-माँ सो चुके थे। वीरभद्र ने गौरांगी को उठाया। वो अब पूरी तरह बदल चुकी थी — डरती नहीं, बल्कि उत्सुक थी। उसने लाल साड़ी पहनी, लेकिन ब्लाउज़ का एक हुक जानबूझकर खुला छोड़ा।

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रात के 11 बज चुके थे।
हवेली में सन्नाटा। पिता-माँ सो चुके थे। वीरभद्र ने गौरांगी को उठाया। वो अब पूरी तरह बदल चुकी थी — डरती नहीं, बल्कि उत्सुक थी। उसने लाल साड़ी पहनी, लेकिन ब्लाउज़ का एक हुक जानबूझकर खुला छोड़ा।

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