
चाँदनी अब और चमक रही थी, लेकिन चारों का खेल अब इतना जंगली हो चुका था कि हवा भी गरम लग रही थी। चारपाई पर चार नंगे बदन — पसीने से तर, वीर्य से सने, लाल निशानों से भरे। कोई शर्म नहीं, कोई रोक-टोक नहीं। सिर्फ़ भूख और गंदगी।
वीरभद्र ने दोनों औरतों को चारपाई के बीच में घुटनों के बल बिठाया — गौरांगी और रुक्मिणी आमने-सामने, टाँगें फैली हुईं। उसने दोनों की चूत पर हाथ रखा, उँगलियाँ अंदर डालीं — तेज़, बेरहम।


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