02

रात के अंधेरे में चीखें भी गुम हो जाती हैं।

सिक्का हवा में घूमता हुआ आर्या के पैरों के पास गिरा। खनक की आवाज़ पूरे हॉल में गूँजी और फिर सन्नाटा छा गया। दक्षवीर के आदमी, जो अपनी उंगलियाँ ट्रिगर पर रखे हुए थे, बस उसके एक इशारे का इंतज़ार कर रहे थे।

दक्षवीर अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिला। उसकी काली कमीज के बटन खुले थे और गले में पड़ी सोने की पतली चेन उसकी गंदमी रंगत पर चमक रही थी। वह अपनी आँखों से आर्या को ऐसे देख रहा था जैसे किसी कीमती शिकार की उम्र का अंदाज़ा लगा रहा हो।

"सिक्का उठा लो, लड़की," दक्षवीर की आवाज़ अब और भी धीमी, और भी भारी थी। "ये हमारी तरफ से तुम्हें दी गई पहली और आखिरी खैरात है।"

आर्या ने सिक्के की तरफ देखा भी नहीं। उसने अपना सिर ऊँचा किया। उसके चेहरे पर बारिश की कुछ बूंदें अब भी चमक रही थीं, जो उसकी आँखों की आग को बुझा नहीं पा रही थीं।

"खैरात कमज़ोरों को दी जाती है, राणा। और मैं यहाँ तुमसे कुछ मांगने नहीं आई हूँ," आर्या ने अपनी आवाज़ को स्थिर रखा, हालाँकि उसके अंदर डर की एक हल्की लहर दौड़ रही थी।

दक्षवीर धीरे-धीरे आर्या के चारों तरफ घूमने लगा, जैसे कोई शेर अपने शिकार के इर्द-गिर्द घेरा बनाता है। उसके जूतों की आवाज़ पत्थर के फर्श पर टिक-टिक कर रही थी।

"हौसला तो है तुममें। पर जानते हो यूपी की इस आबोहवा में हौसले का क्या अंजाम होता है?" दक्षवीर रुका, ठीक आर्या के पीछे। उसकी गर्म सांसें आर्या की गर्दन को छू रही थीं। "यहाँ रात के अंधेरे में चीखें भी गुम हो जाती हैं। और तुम... तुम तो इस शहर के लिए एक अजनबी मुसाफिर भर हो।"

आर्या ने पलटकर उसे देखा। दोनों के बीच फासला अब महज़ कुछ इंच का था। "मैं अजनबी ज़रूर हूँ, लेकिन उस तबाही का पता जानती हूँ जिसे तुमने 'राणा लेगेसी' का नाम दे रखा है। तुम्हारे गोदामों में जो बारूद भरा है, उसकी महक लखनऊ की हवाओं में घुल चुकी है।"

दक्षवीर की आँखों में एक पल के लिए चमक आई—हैरानी की नहीं, बल्कि एक ठंडी क्रूरता की। उसने आर्या के बालों की एक लट को अपनी उंगली में लपेटा। आर्या पीछे नहीं हटी।

"बारूद की खुशबू नशीली होती है, आर्या सेन," उसने पहली बार उसका नाम लिया। आर्या चौंक गई। उसने अपना नाम नहीं बताया था।

दक्षवीर मुस्कुराया—एक ऐसी मुस्कान जो किसी को भी अंदर तक कँपा दे। "हैरान हो? इस सूबे में पत्ता भी हिलता है तो उसकी खबर मेरे पास पहुँचने से पहले अपना रास्ता बदल लेती है। मुझे पता है तुम दिल्ली से किस मिशन पर आई हो। और ये भी पता है कि जिस फाइल के दम पर तुम यहाँ खड़ी हो, वो फाइल कल सुबह तक राख हो चुकी होगी।"

उसने आर्या के चेहरे के और करीब आकर फुसफुसाया, "अब बताओ, उस जलती हुई फाइल के साथ खुद को भी खाक करना चाहोगी, या मेरे इस दरबार का तमाशा देखना पसंद करोगी?"

हॉल में मौजूद गुर्गों ने एक साथ अपनी बंदूकों की सेफ्टी हटाई— कड़क-कड़क।

आर्या के पास दो ही रास्ते थे: या तो वो हार मानकर पीछे हट जाए, या उस आग में हाथ डाले जिसका नाम दक्षवीर राणा था।

आगे जानने के लिए पढ़ते रहिए...

और मेरी प्रोफाइल से व्हाट्सएप चैनल जरूर फॉलो करे

Write a comment ...

Apuu

Show your support

Your support helps me continue writing intense dark romance stories like Lusty Devil. Every contribution motivates me to create more thrilling chapters filled with powerful mafia kings, fearless heroines, obsession, passion, and dangerous love stories. With your support, I can dedicate more time to writing, designing better covers, and bringing deeper, more exciting plot twists for you. Thank you for being a part of this journey and helping my stories grow.

Write a comment ...

Apuu

18+Dark Romance Writer | Mafia Love Stories | Obsessed With Powerful Men & Fearless Women